(हिमांशू बियानी/जिला ब्यूरो)
अनूपपुर (अंचलधारा) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक में "पर्यावरण संरक्षण में बिरसा मुंडा का योगदान" विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विश्विद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि "पर्यावरण मानव जीवन का अभिन्न अंग है। जिसके संरक्षण के बिना मानव का अस्तित्व सुरक्षित नही है। पर्यावरण संरक्षण में 'भगवान' बिरसा मुंडा का योगदान अमूल्य है, उन्होंने प्रकृति, जंगलों और जमीन की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती 15 नवंबर को है। भगवान बिरसा मुंडा को 'धरती आबा' के नाम से भी जाना जाता है। इस विशेषण का अर्थ-"पृथ्वी के पिता" मुंडा जी के बहुमूल्य योगदान ने प्रकृति और पर्यावरण से प्यार करने वालों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। मुंडा जी पर्यावरण संरक्षको के प्रेरणा स्त्रोत हैं। पराधीनता के समय में जब अंग्रेजों ने इनके निवास स्थलों पर अतिक्रमण किया तो सीधे-साधे आदिवासियों ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध अपने परंपरागत हथियारों (तीर-धनुष, भाले) से लड़ाई लड़ी बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासी समुदाय ने आजादी की लड़ाई लड़ी और अपनी साहसिक प्रवृत्ति का परिचय दिया। यह आदिवासी और जनजातियां जंगलों, नदी, नालों और जंगली जानवरों के बीच सदियों से सहचर करते आ रहे हैं। यदि कोई इनके क्षेत्रों में अतिक्रमण करें तो ये आदिवासी भी पर्यावरण को बचाने के लिए, जो इनके देवता है को बचाने के लिए खड़े हो जाते हैं। तभी तो यह आदिवासी समुदाय जो सदियों से जंगलों में रहते आ रहे हैं। इन्होंने बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाया था अर्थात उन अंग्रेजो के खिलाफ जिनके राज में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था।
भारत में लगभग 645 अलग-अलग जनजातियाँ निवास करती है। जल, जंगल और 11 को भगवान का दर्जा देने वाले आदिवासी बिना किसी दिखावे के जंगलों और स्वयं के अस्तित्व को बचाने के लिए आज भी प्रयासरत है। यह समुदाय परंपराओं को निभाते हुए शादी से लेकर हर शुभ कार्यो में पेड़ो को साक्षी बनाते है। वन-संरक्षण की प्रबल प्रवृत्ति के कारण आदिवासी वन व वन्य-जीवों से उतना ही प्राप्त करते है जिससे उनका जीवन सुलभता से चल सके व आने वाली पीढ़ी को भी वन-स्थल धरोहर के रूप में दिए जा सके। इनमें वन संवर्धन, वन्य जीवों व पालतू पशुओं का संरक्षण करने की प्रवृत्ति परंपरागत है। इस कौशल दक्षता व प्रखरता की वजह से आदिवासियों ने पहाड़ों, घाटियों व प्राकृतिक वातावरण को आज तक संतुलित बनाए रखा है। आदिवासियो के शादी से लेकर प्रत्येक त्यौहार पेड़ो को साक्षी मानकर पूर्ण किये जाते है, आदिवासियो के वैवाहिक समारोह में सेमल के पत्तो का होना विशेष रस्म माना जाता है।आदिवासी जंगलो से जड़ी-बूटियों का संग्रह, फल-फूल, सब्जियां संग्रहण, लकड़ी एकत्र करते है, उन्हें शहरों में बेचकर अपनी जीविका यापन करते है बदले में वे भरपूर वृक्षारोपण करते है खासकर बारिस के तुरंत बाद वे बड़े स्तर पर तरह-तरह के पेड़ उगाते है, साथ ही बड़े होने तक उनकी देखभाल भी करते है। इस कौशल दक्षता व प्रखरता की वजह से आदिवासियो ने पहाड़ो, घाटियों एवं प्राकृतिक वातावरण को आज तक संतुलित बनाए रखा है। आदिवासी ही इस बात को समझते हैं कि प्राकृतिक जंगल उगाये नहीं जा सकते, खुद बनते है। आदिवासियों ने अपनी सामाजिक व्यवस्था के तहत कुछ बंदिशें स्वयं पर लगा रखी हैं, इन बंदिशों के तहत महुआ, आम, करंज, जामुन, केड आदि के वृक्ष वे नहीं काटते, सखुआ के पेड़ की बंदिश यह कि तीन फुट छोड़ कर ही उसे काटना है। वे जलावन के लिए हमेशा सूखे पेड़ ही काटते हैं इसलिए जहां आदिवासी हैं, वहां जंगल बचे हुए हैं। आदिवासियो की वजह से ही पृथ्वी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से अभी तक बची हुई है, उनके द्वारा जल, जंगल और जमीन के संरक्षण से वातावरण शुद्ध बना हुआ है जो कि नियमित वर्षा, स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, उपजाऊ जमीन सहित संसाधनों की उपलब्धता के लिए अतिआवश्यक है। ज़्यादातर आदिवासी अब भी खेती करते हैं और कभी भी पेड़ों को जलाते नहीं हैं। महुआ का पेड़ इनके लिए किसी कल्पवृक्ष से कम नहीं होता है। वह इनके फलों का संग्रह करते हैं और पूरे साल इनसे बनी रोटी खाते हैं। संवाद की शैली जंगल से निकली है, पेड़ पौधों से निकली है जंतु जानवरों से निकली है, जिसका प्रयोग प्रभु राम ने किया था और आगे चलकर भगवान बिरसा मुंडा ने भी इस को आत्मसात किया।
जैसा कि सभी जानते हैं कि आदिवासियों की ज़्यादातर भूमि अत्यधिक उपजाऊ नहीं होती है और ना ही खेती के योग्य, फिर भी वे वनों में रहते हुए वनों के रहस्य को जानते हैं। खेती से अपनी गुजर-बसर तो कर ही लेते हैं, यदि इससे ज़रूरतें पूरी नहीं हो सकती तो कई आदिवासी समुदाय महुआ को भोजन के रूप में लेते हैं या फिर आम की गुठलियों को पीसकर रोटी बनाकर अपना जीवनयापन करते हैं। लेकिन प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं करते हैं।जंगलों में रहने के कारण आदिवासियों को हरे-भरे पेड़ पौधों व जड़ी-बूटियों की पहचान होती है। वह यह भी जानकारी रखते हैं कि कौन सा पौधा या जड़ी बूटियां किस बीमारी में काम आती हैं।
जनजाति समुदाय आदि काल से ही पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में सबसे आगे रहा है। बिरसा मुंडा का संपूर्ण जीवन जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में न्योछावर हो गया। आज आवश्यकता है, कि हम भारतवासी यह संकल्प लें कि प्रत्येक वर्ष बिरसा मुंडा जी की जयंती 15 नवंबर पर एक पौधा लगाएं और उसका संरक्षण करें। हमारा यह संकल्प आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगा। हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक वृक्ष 10 पुत्रों के बराबर होता है। अतः हमारे द्वारा रोपा गया एक-एक पौधा अरण्ड क्षेत्र को विकसित करेगा।
कार्यक्रम का संचालन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,अमरकंटक के प्रो. पी. सामल,अधिष्ठाता- जनजातीय अध्ययन केंद्र द्वारा किया गया तथा आभार प्रो. शैलेंद्र सिंह भदौरिया, कुलानुशासक द्वारा दिया गया। इस अवसर पर प्रो. ए.के. शुक्ला, भूमि नाथ त्रिपाठी, प्रो. जितेंद्र मिश्रा (ओ.एस. डी.) प्रो. आशीष माथुर सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने ऑनलाइन जुड़कर कार्यक्रम को सफल बनाया।
अनूपपुर (अंचलधारा) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक में "पर्यावरण संरक्षण में बिरसा मुंडा का योगदान" विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विश्विद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि "पर्यावरण मानव जीवन का अभिन्न अंग है। जिसके संरक्षण के बिना मानव का अस्तित्व सुरक्षित नही है। पर्यावरण संरक्षण में 'भगवान' बिरसा मुंडा का योगदान अमूल्य है, उन्होंने प्रकृति, जंगलों और जमीन की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती 15 नवंबर को है। भगवान बिरसा मुंडा को 'धरती आबा' के नाम से भी जाना जाता है। इस विशेषण का अर्थ-"पृथ्वी के पिता" मुंडा जी के बहुमूल्य योगदान ने प्रकृति और पर्यावरण से प्यार करने वालों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। मुंडा जी पर्यावरण संरक्षको के प्रेरणा स्त्रोत हैं। पराधीनता के समय में जब अंग्रेजों ने इनके निवास स्थलों पर अतिक्रमण किया तो सीधे-साधे आदिवासियों ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध अपने परंपरागत हथियारों (तीर-धनुष, भाले) से लड़ाई लड़ी बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासी समुदाय ने आजादी की लड़ाई लड़ी और अपनी साहसिक प्रवृत्ति का परिचय दिया। यह आदिवासी और जनजातियां जंगलों, नदी, नालों और जंगली जानवरों के बीच सदियों से सहचर करते आ रहे हैं। यदि कोई इनके क्षेत्रों में अतिक्रमण करें तो ये आदिवासी भी पर्यावरण को बचाने के लिए, जो इनके देवता है को बचाने के लिए खड़े हो जाते हैं। तभी तो यह आदिवासी समुदाय जो सदियों से जंगलों में रहते आ रहे हैं। इन्होंने बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाया था अर्थात उन अंग्रेजो के खिलाफ जिनके राज में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था।
भारत में लगभग 645 अलग-अलग जनजातियाँ निवास करती है। जल, जंगल और 11 को भगवान का दर्जा देने वाले आदिवासी बिना किसी दिखावे के जंगलों और स्वयं के अस्तित्व को बचाने के लिए आज भी प्रयासरत है। यह समुदाय परंपराओं को निभाते हुए शादी से लेकर हर शुभ कार्यो में पेड़ो को साक्षी बनाते है। वन-संरक्षण की प्रबल प्रवृत्ति के कारण आदिवासी वन व वन्य-जीवों से उतना ही प्राप्त करते है जिससे उनका जीवन सुलभता से चल सके व आने वाली पीढ़ी को भी वन-स्थल धरोहर के रूप में दिए जा सके। इनमें वन संवर्धन, वन्य जीवों व पालतू पशुओं का संरक्षण करने की प्रवृत्ति परंपरागत है। इस कौशल दक्षता व प्रखरता की वजह से आदिवासियों ने पहाड़ों, घाटियों व प्राकृतिक वातावरण को आज तक संतुलित बनाए रखा है। आदिवासियो के शादी से लेकर प्रत्येक त्यौहार पेड़ो को साक्षी मानकर पूर्ण किये जाते है, आदिवासियो के वैवाहिक समारोह में सेमल के पत्तो का होना विशेष रस्म माना जाता है।आदिवासी जंगलो से जड़ी-बूटियों का संग्रह, फल-फूल, सब्जियां संग्रहण, लकड़ी एकत्र करते है, उन्हें शहरों में बेचकर अपनी जीविका यापन करते है बदले में वे भरपूर वृक्षारोपण करते है खासकर बारिस के तुरंत बाद वे बड़े स्तर पर तरह-तरह के पेड़ उगाते है, साथ ही बड़े होने तक उनकी देखभाल भी करते है। इस कौशल दक्षता व प्रखरता की वजह से आदिवासियो ने पहाड़ो, घाटियों एवं प्राकृतिक वातावरण को आज तक संतुलित बनाए रखा है। आदिवासी ही इस बात को समझते हैं कि प्राकृतिक जंगल उगाये नहीं जा सकते, खुद बनते है। आदिवासियों ने अपनी सामाजिक व्यवस्था के तहत कुछ बंदिशें स्वयं पर लगा रखी हैं, इन बंदिशों के तहत महुआ, आम, करंज, जामुन, केड आदि के वृक्ष वे नहीं काटते, सखुआ के पेड़ की बंदिश यह कि तीन फुट छोड़ कर ही उसे काटना है। वे जलावन के लिए हमेशा सूखे पेड़ ही काटते हैं इसलिए जहां आदिवासी हैं, वहां जंगल बचे हुए हैं। आदिवासियो की वजह से ही पृथ्वी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से अभी तक बची हुई है, उनके द्वारा जल, जंगल और जमीन के संरक्षण से वातावरण शुद्ध बना हुआ है जो कि नियमित वर्षा, स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, उपजाऊ जमीन सहित संसाधनों की उपलब्धता के लिए अतिआवश्यक है। ज़्यादातर आदिवासी अब भी खेती करते हैं और कभी भी पेड़ों को जलाते नहीं हैं। महुआ का पेड़ इनके लिए किसी कल्पवृक्ष से कम नहीं होता है। वह इनके फलों का संग्रह करते हैं और पूरे साल इनसे बनी रोटी खाते हैं। संवाद की शैली जंगल से निकली है, पेड़ पौधों से निकली है जंतु जानवरों से निकली है, जिसका प्रयोग प्रभु राम ने किया था और आगे चलकर भगवान बिरसा मुंडा ने भी इस को आत्मसात किया।
जैसा कि सभी जानते हैं कि आदिवासियों की ज़्यादातर भूमि अत्यधिक उपजाऊ नहीं होती है और ना ही खेती के योग्य, फिर भी वे वनों में रहते हुए वनों के रहस्य को जानते हैं। खेती से अपनी गुजर-बसर तो कर ही लेते हैं, यदि इससे ज़रूरतें पूरी नहीं हो सकती तो कई आदिवासी समुदाय महुआ को भोजन के रूप में लेते हैं या फिर आम की गुठलियों को पीसकर रोटी बनाकर अपना जीवनयापन करते हैं। लेकिन प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं करते हैं।जंगलों में रहने के कारण आदिवासियों को हरे-भरे पेड़ पौधों व जड़ी-बूटियों की पहचान होती है। वह यह भी जानकारी रखते हैं कि कौन सा पौधा या जड़ी बूटियां किस बीमारी में काम आती हैं।
जनजाति समुदाय आदि काल से ही पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में सबसे आगे रहा है। बिरसा मुंडा का संपूर्ण जीवन जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में न्योछावर हो गया। आज आवश्यकता है, कि हम भारतवासी यह संकल्प लें कि प्रत्येक वर्ष बिरसा मुंडा जी की जयंती 15 नवंबर पर एक पौधा लगाएं और उसका संरक्षण करें। हमारा यह संकल्प आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगा। हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक वृक्ष 10 पुत्रों के बराबर होता है। अतः हमारे द्वारा रोपा गया एक-एक पौधा अरण्ड क्षेत्र को विकसित करेगा।
कार्यक्रम का संचालन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,अमरकंटक के प्रो. पी. सामल,अधिष्ठाता- जनजातीय अध्ययन केंद्र द्वारा किया गया तथा आभार प्रो. शैलेंद्र सिंह भदौरिया, कुलानुशासक द्वारा दिया गया। इस अवसर पर प्रो. ए.के. शुक्ला, भूमि नाथ त्रिपाठी, प्रो. जितेंद्र मिश्रा (ओ.एस. डी.) प्रो. आशीष माथुर सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने ऑनलाइन जुड़कर कार्यक्रम को सफल बनाया।

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