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शिक्षा ने बिरसा को भगवान बनाया है-प्रो.श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी

 

(हिमांशू बियानी/जिला ब्यूरो)

अनूपपुर (अंचलधारा) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक में "शिक्षा और संस्कृति के उत्थान में बिरसा मुंडा का दृष्टिकोण" विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विश्विद्यालय के कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि "अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध भारत देश के विभिन्न भौगोलिक प्रदेशों में और सामाजिक वर्गों ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए प्रयत्न किये गये। विभिन्न नायकों के नेतृत्व में देश के अनेक भागों में अंग्रेजों के विरुद्ध शांतिपूर्ण तथा सशस्त्र संघर्ष छेड़े गये। ऐसे ही एक बड़े संघर्ष के नायक थे बिरसा मुंडा, जिन्हें बिहार, झारखण्ड और छोटा नागपुर क्षेत्र के लोग, विशेषकर हमारे वनवासी भाई-बहन भगवान बिरसा मुंडा कह कर बुलाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में बिरसा मुंडा का नाम देश के स्वतंत्रता सेनानियों की प्रथम पंक्ति में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है।
भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को उलीहातु में हुआ था।बचपन से ही बिरसा पढ़ाई में तेज थे, स्थानीय शिक्षक जयपाल नाग ने सुझाव दिया कि बालक बिरसा को चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में प्रवेश ले लेना चाहिए। लेकिन विडम्बना यह थी कि स्कूल में प्रवेश के लिए ईसाई धर्म में परिवर्तित होना अनिवार्य था।  कुछ समय तक अध्ययन करने के बाद, उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल छोड़ दिया और वैष्णव भक्त आनंद पांडे के सम्पर्क में आने पर वर्ष 1895 में महज 20 साल के युवा बिरसा मुंडा ने ईसाई धर्म त्याग दिया और हिंदू धार्मिक शिक्षाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त किया और रामायण और महाभारत के साथ-साथ पुराने शास्त्रों का अध्ययन किया।
बिरसा ने जनेऊ धारण किया, वे वैष्णव बन गए और तुलसी के पवित्र पौधे की पूजा करनी प्रारम्भ की और गोहत्या वर्जित घोषित कर मांसाहार का त्याग कर दिया। बिरसा मुंडा वास्तव में अपने समय से कहीं आगे की सोच रखने वाले दूरदर्शी व्यक्तित्व थे। प्रगतिशील दृष्टि वाले बिरसा अपने वनवासी समाज में सुधार करना चाहते थे और इसलिए उन्होंने जादू-टोने और अंधविश्वासों का विरोध कर अपने समाज को जागृत किया और इसके बजाय ईश्वर में विश्वास रखना और नियमित प्रार्थना के महत्व पर जोर दिया, शराब आदि नशीले पदार्थों के त्याग, नैतिक आचार संहिता के पालन और अच्छे चरित्र के निर्माण पर बहुत बल दिया।
बिरसा मुंडा के आत्म-विश्वास, आध्यात्म व सत्य आधारित वक्तृत्व-शक्ति, नैतिकता पूर्ण जीवन, वनवासी समाज के सामाजिक-आर्थिक उत्थान की व्यग्रता और निरंतर प्रवास ने उन्हें वनवासी समुदायों में एक चमत्कृत व्यक्तित्व के रूप में स्थापित कर दिया। उनके दैवीय-आध्यात्मिक व्यक्तित्व के कारण वनवासी समुदायों में उन्हें भगवान के रूप में पूजा जाने लगा। उनके द्वारा किये गये चमत्कारों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में वनवासी उनके अनुयायी बन गये। भगवान बिरसा ने एक नये पंथ का सृजन किया जिसे बिरसाइत पंथ कहा जाता है। बड़ी संख्या में मुंडा, उरांव और खारिया वनवासी लोगों ने इस पंथ को स्वीकार किया।
अंग्रेजों द्वारा वनवासी समुदायों का आर्थिक शोषण, बिरसा मुंडा के लिए असहनीय था। यह  ब्रिटिश राज के खिलाफ उनका आह्वान ‘अबुआ राज सेतेर जना, महारानी राज तुंदु जना’ (रानी का राज्य समाप्त होने दो और हमारा राज्य स्थापित किया जाए) था, जिसे आज भी झारखण्ड, ओड़िसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और बिहार के वनवासी क्षेत्रों सहित पूरे भारत में याद किया जाता है।
ईसाई धर्म प्रचारकों के विरुद्ध बिरसा मुंडा ने बिगुल बजाया। स्वामी दयानंद की भांति उन्होंने भी वनवासियों को अपने धर्म में वापिस लौटने का आह्वान किया। बिरसा मुंडा इस बात से भली-भांति परिचित थे कि अगर कोई वनवासी धर्म परिवर्तन करता है तो न केवल अपनी सभ्यता-संस्कृति में एक व्यक्ति कम होता है बल्कि आनेवाले समय में धर्म परिवर्तित व्यक्ति एक विरोधी के रूप में समाज के समक्ष एक चुनौती प्रस्तुत करता है। ईसाई धर्म के प्रभाव में बिरसा मुंडा ने वनवासी इतिहास तथा कला-संस्कृति के होने वाले ह्रास के सम्बन्ध में वनवासियों को जागरूक करने का अभियान चलाया। उन्होंने ने केवल स्वयं हिन्दू धरम के आध्यात्मिक और धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया बल्कि वनवासी समुदायों को भी इन ग्रन्थों को पढने और अपनी मूल संस्कृति को सहेजने की प्रेरणा दी।
बिरसा मुंडा जी के योगदान को स्वीकार करते हुए झारखण्ड राज्य का गठन भी वर्ष 2000 में भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर किया गया था। बिरसा मुंडा देश के पहले वनवासी नेता हैं जिनका चित्र 16 अक्तूबर 1989 को संसद भवन में लगाया गया। उन पर 15 नवंबर 1989 को विशेष डाक टिकट जारी किया गया। वास्तव में बिरसा मुंडा को वनवासी सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और आर्थिक अधिकारों का आरंभिक संरक्षक कहा जा सकता है। मुंडा एक असाधारण लोकनायक हैं। आने वाले दिनों में 15 से 22 नवम्बर तक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय, अमरकंटक में बिरसा मुंडा जी से सम्बंधित कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना सुनिश्चित किया गया है।"
कार्यक्रम का संचालन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के . शैलेंद्र सिंह भदौरिया, कुलानुशासक द्वारा किया गया तथा आभार प्रो.ए.के. शुक्ला द्वारा दिया गया। इस अवसर पर प्रो. पी. सामल, अधिष्ठाता- जनजातीय अध्ययन केंद्र, प्रो. जितेंद्र मिश्रा (ओ.एस. डी.) सहित बड़ी संख्या में शिक्षक एवं विद्यार्थियों ने ऑनलाइन जुड़कर कार्यक्रम को सफल बनाया।

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