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आईजीएनटीयू में रामायण की सामाजिकता और सांस्कृतिक विरासत पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

 

(हिमांशू बियानी/जिला ब्यूरो)

अनूपपुर (अंंचलधारा) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विभाग द्वारा 'रामायण की सामाजिकता और सांस्कृतिक विरासत' विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की शुरुआत दिप प्रज्ज्वलन, सरस्वती वंदना एवं विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुई। स्वागत भाषण प्रोफेसर अभिलाषा सिंह द्वारा दिया गया, विश्वविद्यालय की विकास यात्रा की जानकारी प्रोफेसर रेणु सिंह द्वारा दी गई और प्रोफ़ेसर कृष्णा सिंह द्वारा संकाय की जानकारी उपलब्ध कराई गई। तत्पश्चात विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी द्वारा अपने उद्बोधन में "भगवान राम और रामायण की जनमानस में उपयोगिता को बताया गया, उन्होंने कहा कि भगवान राम के अंदर आदि और अंत दोनों है, भगवान राम में संपूर्ण संसार समाहित है। भगवान राम से संवाद अर्थात आत्मा से संवाद है। आज श्री चित्रकूट तुलसीपीठाधीश्वर पद्मविभूषण जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज जी के चरणों से विश्वविद्यालय की धरा पावन हो गई है।"
                    कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री चित्रकूट तुलसीपीठाधीश्वर पद्मविभूषण जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज जी ने अपने उद्बोधन में विश्वविद्यालय परिवार को इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की बधाई देते हुए कहा कि रामायण की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत है। नाटकों में 'सामाजिक' शब्द का प्रयोग बहुत होता है। समाज और संस्कृति शब्द प्राचीन हैं, समाज उसे कहते हैं जो पशु प्रवृत्ति से ऊपर उठ जाता है। समाज राष्ट्र की जागरूक प्रतिभा है। रामायण में बताया गया है कि पशुओं का भी समाज होता है, वानरों का समाज होता है, पक्षियों का भी समाज होता है।अर्थात जिसमें कर्तव्य बोध है वह समाज का अंग है। रामायण में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं जब पशु पक्षियों ने भगवान श्रीराम का साथ दिया और अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए। वानरों के अंतस में मानवता का बोध होता है। रामायण में एक पक्षी जटायु का उल्लेख मिलता है जिसने प्रतिरोध किया क्योंकि उसको अपने कर्तव्यों का बोध था। यहां कर्तव्य ही मानवता है। संस्कृति एक व्यवस्था है और समाज उसकी परिणति है। जहां गतिशीलता में अनुशासन होता है वहां समाज है। रामायण मनुष्यों से पशु प्रवृत्ति को हटाने का कार्य करती है और उसे कर्तव्य बोध बनाती है। जिसके जीवन में साहित्य संगीत और कला में से किसी एक का भी आगमन हो जाता है उसके मन, कर्म और वचन से पशुता मिट जाती है। रामायण में भगवान राम और केवट का प्रसंग मिलता है जो हिन्दू और हिंदुत्व की संपूर्ण व्याख्या करता हैं। हिंदू शब्द भारतीयता का पर्याय है। समाज और संस्कृति दोनों की धरोहर है 'रामायण' हम सभी को पढ़ना चाहिए और उसे अपने जीवन में ढालना चाहिए।"
        उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. ऋषि पालीवाल द्वारा किया गया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. गोविंद नारायण मिश्र द्वारा दिया गया। कार्यक्रम मे बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, अधिकारीगण, शिक्षकगण एवं कर्मचारीगण की उपस्थित देखी गई।

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