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स्वतंत्रता आंदोलन और शिक्षा में अभूतपूर्व योगदान के लिए जाने जाते हैं पं. मदनमोहन मालवीय-कुलपति

 

(हिमांशू बियानी/जिला ब्यूरो)

अनूपपुर (अंचलधारा) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और शिक्षा के क्षेत्र में आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय में "स्वतंत्रता आंदोलन और शिक्षा के क्षेत्र में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की भूमिका" विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 8 अगस्त, 2021 को ऑनलाइन गूगल मीट प्लेटफार्म पर विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय द्वारा किया गया है। जिसमें स्वतंत्रा आंदोलन एवं शिक्षा के क्षेत्र में मालवीय जी के योगदानों को याद करने के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक, मध्यप्रदेश के माननीय कुलपति प्रोफ़ेसर श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी जी तथा प्रेरणा स्रोत विश्वविद्यालय की प्रथम महिला ममतामई श्रीमती शीला त्रिपाठी, मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफेसर आर. एन. त्रिपाठी (सदस्य उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग प्रयागराज उत्तर प्रदेश, जो कि वर्तमान में समाजशास्त्र विभाग काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं), संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. बालमुकुंद पांडे (राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना - नई दिल्ली), प्रोफेसर एम.टी.वी. नागा राजू (अधिष्ठाता शिक्षा संकाय), सहसंयोजक प्रोफेसर ज्ञानेंद्र कुमार रावत (विभागाध्यक्ष शिक्षा विभाग) तथा आयोजन सचिव डॉक्टर देवी प्रसाद सिंह ऑनलाइन उपस्थित रहे।
माननीय कुलपति प्रोफ़ेसर श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के व्यक्तित्व के बारे में बताया कि "ऐसा व्यक्ति जो मदन मोहन हो अर्थात स्वतंत्रता आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने के बाद भी जिसके अंदर मद ना हो, स्वतंत्रता आंदोलन में मालवीय जी भारतीय परंपरा के पोषक कहे जाते हैं, चिंतन धारा के विस्तारक कहे जाते हैं और संस्कृत पुरुष के नाम से जाने जाते हैं। शिक्षा से संस्कृति, संस्कृति से संस्कार, संस्कार से उद्धार, और उद्धार से पूर्ण विकास होता है। इसलिए वह सत्यमेव जयते का उदघोष सदैव करते थे। बाद में यह इस देश का लोक वाक्य बन गया। उनकी वाणी में भारतीय आत्मा का प्रकटीकरण था इसलिए उनकी महत्ता पहले भी थी और आज भी प्रासंगिक है। मालवीय जी भारत माता के रत्न तथा भारत रत्न प्रख्यात राष्ट्रवादी हिंदू संस्कृति के सच्चे पोषक, मातृभाषा हिंदी के प्रिय पुत्र, विद्वान अधिवक्ता, उच्च कोटि के शिक्षा शास्त्री थे। उनका कहना था कि यदि देश का अभ्युदय चाहते हो तो सब प्रकार से यत्न करो की देश में कोई बालक और बालिका निरीह ना रहे शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास भी होता रहे। मेरा बचपन नामक लेख में उन्होंने लिखा है, कि स्वास्थ्य के तीन खंबे हैं आहार, शयन तथा ब्रम्हचर्य इन तीनों को युक्ति पूर्वक सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा होता है महामना जी की दृष्टि आज हमारा मार्गदर्शन करती है और करती रहेगी। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफेसर आर.एन. त्रिपाठी ने कहा भारतीय राष्ट्रीयता का आधार हिंदुत्व है, हिंदुत्व की अवनति से संसार की अवनति होगी हिंदुत्व विहीन राष्ट्रीयता जीवित नहीं रह सकती है। अतः हिंदुत्व पर आधारित राष्ट्रभक्ति को शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए सेवा धर्म ही परम धर्म है, इसलिए राष्ट्र के व्यक्तियों में ऐसी भावना का विकास होना चाहिए। शिवा धर्म को अनुभव से प्राप्त किया जा सकता है केवल किताबों में पढ़कर नहीं, देश को स्वच्छ रखना है तो हर व्यक्ति को सफाई करना होगा। गुरु रविंद्र नाथ टैगोर जी महामना जी को जागृत भगवान की संज्ञा देते थे। विद्यार्थियों के लिए महामना मालवीय जी कहते थे दूध पियो कसरत करो और जपो हरी का नाम, मन लगाय विद्या पढ़ो पूरे होंगे सब काम। महामना जी ने काशी को विश्वविद्यालय खोलने के लिए इसलिए चुना था क्योंकि काशी में उच्च कोटि की कला और संस्कृति का केंद्र था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय सर्व शिक्षा की राजधानी कही जाती है क्योंकि वहां आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विकास के साथ उद्योगों एवं कलाओं का समावेश है। वहां कृषि, चिकित्सा शास्त्र, आयुर्वेद, संगीत एवं ललित कलाओं, धार्मिक शिक्षा और साहित्यिक शिक्षा का केंद्र है। भारत केवल हिंदुओं का देश नहीं है बल्कि यह मुस्लिम, ईसाई और परिसयो का भी देश है। देश तभी विकास और शक्ति प्राप्त कर सकता है जब विभिन्न समुदाय के लोग परस्पर प्रेम और भाईचारे के साथ जीवन व्यतीत करेंगे यह मेरी इच्छा और प्रार्थना है, कि प्रकाश और जीवन का यह केंद्र जो अस्तित्व में आ रहा है वह ऐसे छात्र प्रदान करेगा जो अपने बौद्धिक रूप से संसार के दूसरे श्रेष्ठ छात्रों के बराबर होंगे। बल्कि एक श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करेंगे जो अपने देश से प्यार करेंगे और परम पिता के प्रति ईमानदार रहेंगे। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ बालमुकुंद पांडे जी ने कहा कि मैं इतिहास का शोधार्थी रहा हूं परंतु माध्यमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक मालवीय जी के बारे में कहीं भी किताबों में लिखित जानकारी नहीं मिलती मालवीय जी को बहुत बाद में भारत रत्न से सम्मानित किया गया ऐसे महापुरुष को इतिहास के पन्नों से सर्वथा दूर रखा गया। मालवीय जी ने हिंदी पर बहुत बृहद कार्य किया है, यदि मालवीय जी के श्लोक को इकट्ठा किया जाए तो 300 से 400 पृष्ठों की एक किताब प्रकाशित हो जाएगी। पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने अपनी अभिनव सोच, कुशल नेतृत्व एवं रचनात्मक पहल से केवल अपने संस्थान नहीं, अपने प्रदेश नहीं, बल्कि देश और दुनिया को ऋणी कर दिया है। मालवीय जी अपनी जमीन, संस्कार और संस्कृति से जुड़े रहकर निष्काम कर्म करते हुए असतो मा सद्गमय तथा मृत्योर्मा की ओर चले। किसी भी संकट का मिलजुल कर सामना करना हमारी संस्कृति है यही महामना का भी विचार था।
इस राष्ट्रीय वेबीनार में आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापन प्रोफेसर ज्ञानेंद्र कुमार रावत (शिक्षा संकाय) ने किया तथा कार्यक्रम का संचालन डॉ. देवी प्रसाद सिंह (सहायक आचार्य शिक्षा विभाग) के द्वारा तथा तकनीकी सहयोग डॉ. अरविंद गौतम और विनोद वर्मा द्वारा किया गया। इस वेबीनार में देश भर से अनेक शिक्षाविद, छात्र और शोधार्थी जुड़े और उन्होंने मालवीय जी के विचारों को आत्मसात किया।

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