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हिंदी का प्रयोजनमूलक पक्ष विषय पर इंगाँराजवि में दो दिवसीय प्रशासनिक राजभाषा कार्यशाला आयोजित

 

हिंदी जयघोष की भाषा
 है-प्रो.श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी
(हिमांशू बियानी/जिला ब्यूरो)
अनूपपुर (अंंचलधारा) इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के राजभाषा प्रकोष्ठ द्वारा “हिंदी का प्रयोजनमूलक पक्ष” विषय पर दिनांक 14 जुलाई 2022 को दो दिवसीय प्रशासनिक राजभाषा कार्यशाला का उद्घाटन सत्र संपन्न किया गया।उक्त कार्यशाला का उद्देश्य विश्वविद्यालय के प्रशासनिक प्रमुखों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अपने दैनंदिन कार्यालयीन दायित्वों में प्रशासनिक हिंदी के व्यावहारिक प्रयोग में सक्षम करना था। इस कार्यशाला की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति  प्रो.श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी द्वारा की गई जिसमें आमंत्रित अतिथियों के रूप में प्रो. सुरेन्द्र दुबे (पूर्व कुलपति; सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, गोरखपुर), प्रो. राम मोहन पाठक! (पूर्व कुलपति; दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई) तथा डॉ. अचला पाण्डेय (सहायक प्राध्यापक; हिंदी विभाग, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय) उपस्थित थे।
              सर्वप्रथम इंगाँराजवि के कुलगीत के प्रसार तथा सम्माननीय अतिथियों के स्वागत के पश्चात स्वागत भाषण राजभाषा प्रकोष्ठ की हिंदी अधिकारी एवं कार्यशाला संयोजक डॉ. अर्चना श्रीवास्तव द्वारा दिया गया जिन्होंने अध्यक्ष महोदय, आमंत्रित अतिथियों तथा उपस्थित समस्त शैक्षणिक एवं गैर-शैक्षणिक कर्मियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के प्रयोजन के बारे में जानकारी प्रदान की।
सम्माननीय अतिथि प्रो. राम मोहन पाठक ने अपने उद्बोधन में अपने दक्षिण भारत के कार्यानुभव साझा करते हुए वहाँ आधारभूत हिंदी में संलिप्त छात्रों की संख्या के लगभग दस लाख होने के तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि हिंदी अब प्रश्न की भाषा न रहते हुए समाधान की भाषा है। उन्होंने व्यक्त किया कि जब तक कोई भाषा हमारे भाव एवं भावना की भाषा नहीं बन पाएगी, तब तक उसके राष्ट्रभाषा बनने की संभावना भी न्यूनतम रहेगी।
          मुख्य अतिथि प्रो. सुरेन्द्र दुबे ने अपने वक्तव्य में हिंदी भाषा के साहित्यिक, सर्जनात्मक एवं बोलचाल के परिप्रेक्ष्यों पर चर्चा करते हुए संविधान में उल्लिखित राजभाषा अधिनियम के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चीन, रूस, जापान, फ्रांस, जर्मनी एवं कोरिया जैसे देशों में अधिकतम सूचना,साहित्य का सृजन उनकी संबंधित भाषा में ही किया जाता है तथा हमें अपने कार्य में अधिकाधिक हिंदी का प्रयोग सुनिश्चित करना ही होगा। उन्होंने सभी को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त कम से कम एक और भारतीय भाषा में प्रवीण होने की ओर प्रयास करने पर बल दिया।
            विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सभी भाषाओं का सम्मान करने पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवेश का प्रभाव भाषा पर पड़ता है तथा वृत्ति, प्रवृत्ति, प्रकृति की भाषा को ही महत्व दिया जाता है। आज हिंदी उदघोष से आगे जयघोष की भाषा बन गई है। उन्होंने विश्वविद्यालय के समस्त कर्मचारियों को अपने दैनंदिन कार्यों में राजभाषा प्रकोष्ठ द्वारा वितरित प्रशासनिक शब्दावली का निरंतर संदर्भ लेने के निर्देश दिए।
                    प्रशासनिक कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में डॉ. अचला पाण्डेय तथा विश्वविद्यालय की प्रथम महिला एवं श्री शील मंडल की अध्यक्षा श्रीमती शीला त्रिपाठी की विशेष उपस्थिति रही। समस्त सत्र के दौरान विभिन्न शैक्षणिक विभागों के अधिष्ठाता, अनुभागों के प्रशासनिक प्रमुख, अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। कार्यशाला का संयोजन हिंदी अधिकारी डॉ.अर्चना श्रीवास्तव एवं संचालन डॉ.वीरेन्द्र प्रताप, सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग द्वारा किया गया।      

              

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