सनातन संस्कृति में
गुरुभक्ति का है विशेष महत्त्व
(हिमांशू बियानी/जिला ब्यूरो)
अनूपपुर (अंंचलधारा) गुरू गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय एक सामान्य पंक्ति नहीं अपितु गुरू के माहात्म्य को व्यक्त करने वाली पंक्ति है। विद्वानों ने इस पंक्ति के माध्यम से गुरू को ईश्वर के तुल्य बताया है। इस पंक्ति के माध्यम से गुरू को ईश्वर के रूप में चित्रित किया गया है और वर्तमान पीढ़ी में गुरु शिष्य परंपरा को जीवंत बनाए रखने के लिए हर किसी की नैतिक जिम्मेदारी है कि अपने बच्चों को गुरु के महत्त्व के विषय में बताएं। समाज के उत्थान और किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन में सफलता पर गुरु का विशेष स्थान होता है और गुरुसमूचे समाज का सृजनकर्ता होता है। वर्तमान शिक्षण संस्थानों में भी पश्चिमी सभ्यता का समावेश हो जाने से वर्तमान में गुरु शिष्य परंपरा विलुप्तता की ओर है और यही सामाजिक पतन का सबसे बड़ा कारण है।मन में गुरू
की आराधना
की आराधना
गुरु पूर्णिमा उन सभी आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित परम्परा है, जो कर्म योग आधारित व्यक्तित्व विकास और प्रबुद्धता प्रदान करने के लिए बिना किसी मौद्रिक खर्चे के अपनी बुद्धिमता को साझा करने के लिए तैयार हों। यह पर्व हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों के अनुयायियों के द्वारा अपने आध्यात्मिक शिक्षकों, अधिनायकों के सम्मान और उन्हें अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करने हेतु मनाया जाता है। यह पर्व हिन्दू पंचांग के हिन्दू माह आषाढ़ की पूर्णिमा मनाया जाता है। इस उत्सव को महात्मा गांधी ने अपने आध्यात्मिक गुरु श्रीमद राजचन्द्र सम्मान देने के लिए पुनर्जीवित किया। ऐसा भी माना जाता है कि व्यास पूर्णिमा वेदव्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर लोग आध्यात्मिक रूप से अपने मन में गुरू को स्थापित कर उनकी आराधना करते हैं और गुरु चरणों का आशीर्वाद लेकर इस पावन पर्व को धूमधाम से मनाते हैं।
दर्शन कर खुद को
बताया सौभाग्यशाली
बताया सौभाग्यशाली
जिले की धर्म नगरी अमरकंटक में रहने वाले परम धर्म सांसद शहडोल व मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव श्रीधर शर्मा ने बताया कि गुरु दर्शन कर हमारा जीवन धन्य हो गया है और हमारे जीवन रूपी नाव में गुरु सदैव एक खेवैया की भूमिका में होते हैं और जब भी हमारे जीवन में किसी प्रकार की उथल पुथल की डरावनी लहरें उत्पन्न होती हैं तो हमेशा गुरु ही एक कुशल खेवैया के समान हमारी सारी मुश्किलों से हमें निकाल कर नैया पार लगाने का कार्य करते हैं।
संगम ने मन को
किया प्रफुल्लित
किया प्रफुल्लित
यह सौभाग्य ही है कि गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर से केवल दो दिवस पूर्व एकादशी के पावन पर्व पर गुरु चरणों का आश्रय प्राप्त हुआ और इस अलौकिक संगम ने मन को प्रफुल्लित किया और इस खुशियाली भरे लम्हे में गुरुजी का सानिध्य पाकर ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे जीवन धन्य हो गया। यह गुरु कृपा ही है कि एकादशी के इस पवित्र अवसर पर मुझे अपने गुरु आश्रम परमहंशी गंगाआश्रम से लगे जगन्नाथ जी का स्थान बलासपुर से श्री जगन्नाथ जी शोभा यात्रा में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हमारे समाज में गुरुओं का विशेष स्थान है और वर्तमान पीढ़ी को इस पर अमल करने की आवश्यकता है।

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