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महामंडलेश्वर लक्ष्मणदास बालयोगी ने दो बार पूरी की पंचाग्नि कोट खप्पर धुनी साधना 36 वर्ष तक चला हठयोग

 

(हिमांशू बियानी/जिला ब्यूरो)

अनूपपुर (अंंचलधारा) जिनके दर्शन मात्र से जीवन के पाप संताप मिट जाया करते हैं जीव को मुक्ति मिल जाती है उन मां नर्मदा जी का उद्गम स्थल है अमरकंटक दिव्य तपोभूमि अमरकण्टक और माँ नर्मदा जी का अमरकण्टक से लेकर खम्भात की खाडी तक फैला हुआ किनारा जिसके बारे में कहा जाता है ‘‘नर्मदा तीरे तपरू कुर्यात‘‘जहां का हर कंकर शिव शंकर के रूप में पूजा जाता हो जिस दिव्य अलौकिक भूमि को साधना और तप के लिए हिमालय से भी ज्यादा श्रेष्ठ माना गया हो उसी अमरकंटक स्थित बर्फानी आश्रम के पीठाधीश्वर, तेरह भाई त्यागी के महंत, दिगंबर अखाड़े के महामंडलेश्वर लक्ष्मणदास बालयोगी जहाँ लम्बे समय से बिराजमान हैं वहीं उन्होंने अमरकण्टक से लेकर खम्भात की खाडी तक अनेक स्थानों में रहकर लगातार 36 वर्षों से पंचाग्नि हठयोग कोटा खप्पर धुनी साधना दो बार पूरी की हो उसका समापन गंगा दशहरा के पावन अवसर पर 9 जून 2022 को होगा। इस दिन बर्फानी आश्रम में पूजा हवन और भंडारे का भी आयोजन किया गया है। 

क्या है पंचाग्नि कोट 
खप्पर धूनी साधना


इस साधना के विषय में बर्फानी आश्रम के पीठाधीश्वर आचार्य लक्ष्मणदास बालयोगी ने बताया कि दिगंबर अखाड़े के रामानंदी संप्रदाय के बैरागी साधु इस साधना को करते हैं और यह साधना वर्ष में बसंत पंचमी से प्रारंभ होकर गंगा दशहरा तक 4 माह तक चलती है गुरु आज्ञा गुरु दीक्षा लेकर शुरू की गई इस साधना को हठ योग साधना भी कहा जाता है परंतु बैरागी समाज इसे हठ योग साधना नहीं मानता जिसका कारण है कि इस साधना के अंतर्गत सात्विक रूप से आराधना पूजन हवन और मंत्र जाप किया जाता है जबकि हठ योग साधना में शरीर को स्थिर रह कर हठ पूर्वक तपाया जाता है।

तीन,तीन वर्ष के 6 चक्रों 
में पूरी होती है साधना


पंचगनी हठ योग साधना 3-3 वर्षों के अंतराल में 6 चक्रों में पूरी की जाती है यह साधना 18 वर्षों में पूरी होती है पहले चक्र को पंच धुनी साधना, दूसरे चक्र को सप्त धुनी साधना, तीसरे चक्र को द्वादश धुनी साधना चौथे चक्र को 84 धुनी साधना पांचवें चक्र को कोट धुनी साधना और छठे चक्र को कोट खप्पर धुनी साधना कहा जाता है, इस साधना के अंतर्गत साधक अपने चारों तरफ गोबर के कंडे को जलाकर बीचो बीच बैठकर अपनी साधना को पूरी करता है।

15 वर्ष की आयु में 
शुरू की थी साधना


बर्फानी आश्रम अमरकंटक के पीठाधीश्वर दिगंबर अखाड़े के महामंडलेश्वर आचार्य लक्ष्मणदास बालयोगी ने बताया कि वह 15 वर्ष की कम आयु में ही 1986 से इस साधना की शुरुआत पूज्य गुरुदेव ब्रह्मर्षि बर्फानी दादाजी की आज्ञा से शुरू की थी वैसे तो यह साधना 18 वर्ष में पूरी हो जाती है परंतु  लक्ष्मणदास बालयोगी ने इस साधना को 36 वर्षों में दो बार पूरी करके ‘‘तपोभूमि से निकला योगी, अमरकंटक का बालयोगी‘‘ की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं।

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