(हिमांशू बियानी/जिला ब्यूरो)
अनूपपुर (अंचलधारा) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक में "जनजातीय गौरव दिवस (भगवान बिरसा मुंडा की जयंती) पर विश्वविद्यालय में साप्ताहिक कार्यक्रम श्रृंखला के अंतर्गत 'स्थानीय वैद्य सम्मेलन' का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य अतिथि अटल बिहारी वाजपेई विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति एवं राष्ट्रीय समाज विज्ञान परिषद के अध्यक्ष प्रो. ए.डी.एन. बाजपेई ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय समाज पूर्वजों को याद रखता है। 700 वर्षों से इतिहास के पन्नों पर जमी धूल को साफ करने में आजाद भारतीयों को 75 वर्ष लग गए। इस धूल के नीचे मिट्टी नहीं थी बल्कि अंगारे थे, जिसे सकारात्मक पवन ने एक मशाल का रूप दे दिया है। यह मशाल आजादी के अमृत महोत्सव में गौरव दिवस के रूप में स्थापित हो गई, जिसके तल में भगवान बिरसा मुंडा का कार्य क्षेत्र है। भारत में 702 जनजातियां हैं। अतः बात होनी चाहिए वैदिक परंपरा से अलौकिक परंपरा की क्योंकि जनजातीय समाज में कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा जैसी कोई बुराई आज तक दिखाई नहीं दी। यह अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति शब्द भी अंग्रेजों की षड्यंत्रकारी नीति का हिस्सा है। जनजातीय समाज वैदिक एवं आयुर्वेदिक परंपरा से ओतप्रोत है जिसका हमें लाभ लेना चाहिए और जनजातीय समाज को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शिक्षा का प्रसार अत्यंत आवश्यक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति माननीय प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी जी ने अपने उद्बोधन में बिरसा मुंडा को नमन करते हुए बताया कि कल के बैगा आज के वैद्य नहीं है बल्कि वैद्य से इनका नामकरण बैगा हुआ आज भारतीय वैद्यों के द्वारा इजात काढ़े की विभिन्न किस्मों का सहारा लेकर मानव जीवन ने कोविड-19 महामारी में अपने आप को सुरक्षित रखा। अतः समय है कि इनके नुख्शो का पेटेंट कराया जाए, इनकी विद्या हमें सीखना है और विश्विद्यालय के माध्यम से उस को आगे बढ़ाना है। इस क्षेत्र में गुलबकावली, तुलसी, शिकाकाई एवं रीठा सहित कई औषधियों का उत्पादन बहुतायत में होता है। जिसका औषधि महत्त्व अत्यधिक है, जिसको उचित प्रयोग करके मानव जीवन को निरोगी बनाया जा सकता है। आप जानते हैं कि घास को हम 'दुर्गा' कहते हैं, क्योंकि प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी को दूर्वा अर्पण की जाति है और इसके प्रयोग से ब्लड कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी भी ठीक हो जाती है। प्रत्येक वृक्ष में भगवान का वास होता है। हम यदि उन वृक्षों की पत्तियां या फूल तोड़े तो मंत्रों के साथ विनम्रता से उनसे याचना करते हुए तोड़ना चाहिए। हमें वृक्षों की पूजा करनी चाहिए। वृक्ष मानव को निरोग्यता, निरस्यता एवं अवसाद से बचाने में सहायक होते हैं। इसके लिए शिक्षक और डॉक्टर का सहारा लिया जाता है। आज विश्वविद्यालय इनके लुप्तप्राय हो रहे ज्ञान और जानकारी को वैश्विक मंच पर लाना चाहता हैं। भगवान बिरसा मुंडा के आचार विचार उनके क्रियाकलाप उनका साहित्य न सिर्फ विश्विद्यालय के लिए बल्कि संपूर्ण मानव जगत के लिए कल्याणकारी साबित हो रहा है और आगे भी होगा"।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष द्वारा विभिन्न क्षेत्रों से पधारे 46 वैद्यों का प्रमाण पत्र एवं शॉल व श्रीफल से सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रशांत ने किया कार्यक्रम की रूपरेखा डॉक्टर पूनम शर्मा ने व्यक्त की, कार्यक्रम ली विस्तृत जानकारी प्रो. पी. सामल अधिष्ठाता-जनजातीय अध्ययन केंद्र द्वाराद्वारा दी गई। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ महापात्रा ने अपनी सार्थक भूमिका निभाई। कार्यक्रम में विश्विद्यालय के शैक्षणिक एवं गैर शैक्षणिक तथा प्रशासनिक अधिकारियों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति माननीय प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी जी ने अपने उद्बोधन में बिरसा मुंडा को नमन करते हुए बताया कि कल के बैगा आज के वैद्य नहीं है बल्कि वैद्य से इनका नामकरण बैगा हुआ आज भारतीय वैद्यों के द्वारा इजात काढ़े की विभिन्न किस्मों का सहारा लेकर मानव जीवन ने कोविड-19 महामारी में अपने आप को सुरक्षित रखा। अतः समय है कि इनके नुख्शो का पेटेंट कराया जाए, इनकी विद्या हमें सीखना है और विश्विद्यालय के माध्यम से उस को आगे बढ़ाना है। इस क्षेत्र में गुलबकावली, तुलसी, शिकाकाई एवं रीठा सहित कई औषधियों का उत्पादन बहुतायत में होता है। जिसका औषधि महत्त्व अत्यधिक है, जिसको उचित प्रयोग करके मानव जीवन को निरोगी बनाया जा सकता है। आप जानते हैं कि घास को हम 'दुर्गा' कहते हैं, क्योंकि प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी को दूर्वा अर्पण की जाति है और इसके प्रयोग से ब्लड कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी भी ठीक हो जाती है। प्रत्येक वृक्ष में भगवान का वास होता है। हम यदि उन वृक्षों की पत्तियां या फूल तोड़े तो मंत्रों के साथ विनम्रता से उनसे याचना करते हुए तोड़ना चाहिए। हमें वृक्षों की पूजा करनी चाहिए। वृक्ष मानव को निरोग्यता, निरस्यता एवं अवसाद से बचाने में सहायक होते हैं। इसके लिए शिक्षक और डॉक्टर का सहारा लिया जाता है। आज विश्वविद्यालय इनके लुप्तप्राय हो रहे ज्ञान और जानकारी को वैश्विक मंच पर लाना चाहता हैं। भगवान बिरसा मुंडा के आचार विचार उनके क्रियाकलाप उनका साहित्य न सिर्फ विश्विद्यालय के लिए बल्कि संपूर्ण मानव जगत के लिए कल्याणकारी साबित हो रहा है और आगे भी होगा"।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष द्वारा विभिन्न क्षेत्रों से पधारे 46 वैद्यों का प्रमाण पत्र एवं शॉल व श्रीफल से सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रशांत ने किया कार्यक्रम की रूपरेखा डॉक्टर पूनम शर्मा ने व्यक्त की, कार्यक्रम ली विस्तृत जानकारी प्रो. पी. सामल अधिष्ठाता-जनजातीय अध्ययन केंद्र द्वाराद्वारा दी गई। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ महापात्रा ने अपनी सार्थक भूमिका निभाई। कार्यक्रम में विश्विद्यालय के शैक्षणिक एवं गैर शैक्षणिक तथा प्रशासनिक अधिकारियों ने हिस्सा लिया।

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